क्या प्रवासी मजदूर ले डूबेंगे बीजेपी के हाथ से सत्ता ?

भारतीय जनता पार्टी के सीनियर लीडर्स की गुरुवार को पार्टी चीफ जेपी नड्डा के घर पर मीटिंग हुई। इसमें गृह मंत्री अमित शाह के अलावा कई केंद्रीय मंत्रियों ने हिस्सा लिया।

migrant workers causing trouble for bjp

भारतीय जनता पार्टी के सीनियर लीडर्स की गुरुवार को पार्टी चीफ जेपी नड्डा के घर पर मीटिंग हुई। इसमें गृह मंत्री अमित शाह के अलावा कई केंद्रीय मंत्रियों ने हिस्सा लिया। ये मीटिंग देश में कोरोना के हालातों से निपटने के लिए बुलाई गयी थी। लेकिन इसमें प्रवासी मजदूरों का मुद्दा छाया रहा। बीजेपी ने अपने सभी कार्यकर्ताओं से अपील की है कि वे रोड पर मौजूद मजदूरों कि यथासंभव मदद करें। फिलहाल सवाल ये है कि बीजेपी अचानक से प्रवासी मजदूरों की सुध क्यूं ले रही है? इसके पीछे साफ साफ बीजेपी का डर नज़र आ रहा है। ये डर वोट बैंक खोने का है।

पीएम के सम्बोधन में भी प्रवासी मजदूर

कुछ दिनों पहले पीएम मोदी ने देश के नाम सम्बोधन में कहा था कि ‘हमारे रेहड़ी, ठेला लगाने वाले, पटरी पर सामान बेचने वाले हैं, श्रमिक साथी हैं, घरों में काम करने वाले भाई-बहन हैं। उन्होंने इस दौरान बहुत कष्ट झेले हैं, तपस्या की है, त्याग किया है। अब हमारा कर्तव्‍य है उन्हें ताकतवर बनाने का।’ पीएम बोले कि मैंने राज्यों से कहा है कि वे मजदूरों को उनके राज्य भेजने की व्यवस्था करें क्योंकि अब उन्होने घर लौटने का मन बना लिया है।

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मजदूरों पर कोरोना की मार सबसे भीषण

आपको बता दें सबसे पहले लॉकडाउन का ऐलान पीएम ने राष्ट्र के नाम संबोधन में 24 मार्च को किया था। उस वक़्त सरकार को शायद इतना भी अंदाजा नहीं होगा कि माईग्रेशन की इतनी बड़ी समस्या खड़ी हो जाएगी। अप्रैल के अंत तक ये समस्या काफी भयावह होती चली गयी जिसके बाद केंद्र सरकार ने 1 मई से ‘श्रमिक स्पेशल’ ट्रेनें चलाने का फैसला किया। लेकिन प्रवासी मजदूरों की संख्या लाखों में थीं। आधा मई गुजर चुका है लेकिन मजदूरों की हालत जस के तस है। आलम ये है कि अभी तक मजदूर पैदल ही हजारों किलोमीटर दूर अपने घर की ओर चल दिये हैं। उनके भीतर गुस्सा उबल रहा है कि जब उन्हें सरकारी मजदूरों की सबसे ज्यादा जरूरत थी, तभी सरकार ने अपने हाथ खड़े कर दिये। देश में बंटवारे के बाद पलायन का ऐसा दौर पहली बार देखा गया है।

देशभर से आ रही मजदूरों की दुर्दशा की रिपोर्ट्स

देशभर से प्रवासी मजदूरों की दुर्दशा में रिपोर्ट्स आ रही है। हादसों में करीब 100 मजदूर जान गंवा चुके हैं। जिनकी पैदल चलते चलते सांस थम गईं उनकी कोई गिनती भी नहीं हुई। कुछ रिसर्चर मानते हैं कि लॉकडाउन ने देश को दो अलग अलग हिस्सों में बाँट दिया है। एक हिस्सा वो जो घरों में रहकर लॉकडाउन में दिन काट रहा है, और एक वो है जिसको अपना भविष्य अंधकार में दिखाई दे रहा है। कुछ लोगों की सैलरियां कटी हैं तो लाखों लोगों की पल भर में नौकरियाँ चली गयी हैं। इस लॉकडाउन ने जो पिछले 6 सालों में बीजेपी की प्रो गरीब वाली छवि बनाई है वो कुछ महीनों में गायब सी होती दिखाई दे रही है।

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‘चायवाले’ की छवि से सीधा हुआ था कनेक्ट

पीएम ने गरीबों के सामने चाय वाले की छवि बनाकर सीधा कनेक्ट किया था। वे अपने भाषणों में बार बार गरीबी के दिनों की याद दिलाते थे। लेकिन इस समय जो गरीबों का वोट बैंक तैयार हुआ है उसमें सबसे बड़ी संख्या प्रवासी मजदूरों की है। सरकार ने जिस तरह से लॉकडाउन में कदम उठाए उससे मजदूरों को कोई खास फायदा नहीं हुआ। कर्नाटक में भी बीजेपी सरकार ने पहले मजदूरों के लिए ट्रेन कैंसिल कर दी थी। बवाल हुआ तो यू-टर्न ले लिया। ऐसी बातों से बीजेपी की इमेज को खासा नुकसान पहुंचा है। उसकी भरपाई आसान नहीं होगी।