Hathras Case: क्या होता हैं नार्को या पॉलीग्राफ टेस्ट? कैसे पकड़ में आता हैं इससे झूठ? जानिए सबकुछ…

narco test

हाथरस में दलित लड़की के साथ हुई हैवानियत के मामले ने इस समय तूल पकड़ा हुआ है. केस को लेकर बुरी तरह से घिर चुकी योगी सरकार अब एक्शन मोड में आई. शुक्रवार को रात होते-होते सीएम योगी ने बड़ा एक्शन लिया और हाथरस के एसपी, डीएसपी समेत कई पुलिस अधिकारियों को निलंबित कर दिया.

हाथरस केस में नार्को टेस्ट के आदेश

इसके साथ ही यूपी की योगी आदित्यनाथ सरकार ने दोनों पक्षों (आरोपी, पीड़ित पक्ष) समेत मौके पर मौजूद पुलिस अधिकारियों का पॉलीग्राफ या फिर नार्को टेस्ट कराने के आदेश दिए हैं. ऐसे में आपके मन में ये सवाल जरूर उठ रहा होगा कि ये टेस्ट क्या होता हैं और कैसे इसके जरिए झूठ पकड़ा जाता हैं. आइए आज हम आपको इसके बारे में विस्तार से बताते हैं…

यह भी पढ़े: Hathras Case: हाथरस कांड पर वो 5 गलतियां…जिसको लेकर बुरी तरह से घिर गई हैं योगी सरकार!

पॉलीग्राफ, नार्को और ब्रैन मैपिंग टेस्ट झूठ को पकड़ने की तकनीक होती हैं. मई 2010 में सुप्रीम कोर्ट ने इन जांचों को गैरकानूनी बताया था. हालांकि आपराधिक मामलों में जांच से संबंधित व्यक्तियों की सहमति से करने की इजाजत कोर्ट ने दे दी थी.

पहले जानिए नार्को टेस्ट के बारे में…

सबसे पहले हम आपको नार्को टेस्ट के बारे में बताते हैं. जैसा कि पहले ही बता चुके हैं कि ये झूठ पकड़ने की एक तकनीक हैं. इसमें शख्स को कुछ दवाईयां या फिर इंजेक्शन दिए जाते हैं. आमतौर पर ट्रूथ ड्रग नाम की एक साइकोऐक्टिव दवा दी जाती है या फिर इसके अलावा सोडियम पेंटोथोल का इंजेक्शन लगाया जाता है. दवा देने के बाद वो व्यक्ति अर्धबेहोशी की हालत में चला जाता हैं. वो पूरी तरह से ना तो होश में होता हैं और ना ही बेहोश. इन हालातों में वो सवालों का सही-सही जवाब देता है क्योंकि अर्धबेहोशी की वजह से वो झूठ बोल पाने में नाकाम होता है.

यह भी पढ़े: बिहार-एमपी में दलित युवतियों के साथ गैंगरेप की घिनौनी वारदात, दोनों पीड़िताओं ने की आत्महत्या

पोलीग्राफ टेस्ट से ऐसा पकड़ा जाता हैं झूठ

पोलोग्रॉफी या लाई डिटेक्टर टेस्ट भी झूठ पकड़े जाने की तकनीक हैं. इसमें शख्स से पूछताछ की जाती हैं और वो उसका जवाब देता हैं. इस दौरान एक स्पेशल मशीन की स्क्रीन पर कई ग्राफ बनते हैं. जिसमें व्यक्ति की हृदय गति, सांस, बीपी में बदलाव के मुताबिक ही ग्राफ ऊपर और नीचे होता है. अगर ग्राफ में अचानक ही असामान्य बदलाव दिखने लगे, तो इसका मतलब ये होता हैं कि शख्स झूठ बोल रहा हैं.

टेस्ट की शुरुआत में सामान्य प्रश्न पूछे जाते हैं. उस शख्स से नाम, उम्र, पता, पिता का नाम जैसे कुछ जानकारियां पूछी जाती हैं. इसके बाद अचानक उससे अपराध से जुड़े सवाल किए जाते हैं. अचानक ऐसे सवाल पूछे जाने की वजह से व्यक्ति की सांस, धड़कन और बीपी बढ़ने लगता हैं और ग्राफ में बदलाव दिखने लगता है.

हालांकि ऐसा जरूरी नहीं हैं कि पॉलीग्राफी या फिर नार्को टेस्ट के नतीजे सही ही हो. कुछ हार्डकोर क्रिमिनल ऐसे भी होते हैं, जो इन टेस्ट को चकमा देने में कामयाब हो जाते हैं. हालांकि अगर एक्सपर्ट्स की मानें तो इन टेस्ट को अगर सही ये किया जाए विशेषज्ञों की माने तो अगर इन टेस्ट को ठीक तरीके से किया जाए, तो नतीजे सही निकलते हैं.

यह भी पढ़े: कभी सोनभद्र मामले में धरने पर बैठीं, तो कभी बसों को लेकर बवाल…इन मामलों पर योगी सरकार से भिड़ चुकी हैं प्रियंका गांधी