आपके शरीर की ये चीज कर सकती है कोरोना का काम तमाम, एंटीबाडी से भी ज्यादा कारगर

कोरोना वैक्सीन की चर्चा इस समय देश दुनिया में चारों तरफ चल रही है. लोगों को ये जानना जरूरी है कि आपके शरीर की ऐसी कौन सी चीज है जो कोरोना से लड़ने में काफी अहम पाई गई है.

t cells against corona

कोरोना वैक्सीन की चर्चा इस समय देश दुनिया में चारों तरफ चल रही है. कई मेडिकल कंपनियां वैक्सीन बनाने में जुटी हुई हैं. ऐसे में लोगों को ये जानना जरूरी है कि आपके शरीर की ऐसी कौन सी चीज है जो कोरोना से लड़ने में काफी अहम पाई गई है. इनका नाम है T सेल्स जो कोरोना के खिलाफ एंटीबॉडी से भी ज्यादा तेजतर्रार योद्धा हैं. आइये थोड़ा इनके बारे में संक्षेप में जान लेते हैं.

लंबे वक्त तक इम्युनिटी की गारंटी

दरअसल जब कोरोना वैक्सीन का टेस्ट होता है तो ये देखा जाता है कि इससे शरीर में वायरस के खिलाफ कोई एंटीबॉडी विकसित हो रही है या नहीं. लेकिन कई कंपनी जैसे AstraZeneca Plc, Pfizer Inc. और उसके पार्टनर BioNTech SE के साथ-साथ चीन के CanSino Biologics Inc के डेटा ने शरीर में टी-सेल्स की मौजूदगी को ज्यादा अहम बताया है. यानि अगर टीसेल्स आपके शरीर में काफी लंबे समय तक रहते हैं तो आपकी इम्युनिटी काफी समय तक बरक़रार रहेगी.

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वाइट ब्लड सेल्स का एक प्रकार

आप काफी समय से सोच रहे होंगे कि आखिर टी-सेल्स होती क्या हैं? दरअसल ये एक टी लिम्फोसाइट हैं. ये वाइट ब्लड सेल्स का एक टाइप होता है. बॉडी में जो भी संक्रमित कोशिका है टी-सेल्स उन पर सीधे अटैक करके उन्हें ख़त्म करते हैं. साथ ही दूसरे इम्यून सेल्स को एक्टिव कर देते हैं. इनको एंटीबॉडीज से ज्यादा भरोसेमंद माना जाता है. दरअसल एक रिसर्च की मानें तो एंटीबॉडीज ज्यादा लंबे समय तक एक्टिव नहीं रहते हैं. जबकि टीसेल्स को काफी सालों पुरानी बीमारी भी याद रहती है. कभी भी शरीर पर फिर से पुरानी बीमारी का हमला होता है तो वो उसी तरह रिस्पांस करते हैं.

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17 साल बाद भी सक्रिय है टी सेल्स का रिस्पांस

इसका सबसे बड़ा उदाहरण कोरोना वायरस का ही एक प्रकार SARS है जिसके प्रति 2003 में जिन लोगों में टी सेल्स का रिस्पांस पैदा हुआ था. वो 17 साल बाद भी हैं. यानि अब अगर ये बीमारी उन लोगों को दोबारा अटैक करेगी तो उनके शरीर में मौजूद टी सेल्स इससे खुद ही निपट लेंगी. बता दें कोरोना का हाल भी मरीज दर मरीज अलग है. किसी में इसका हल्का संक्रमण है तो किसी को ये बुरी तरह अपनी चपेट में ले रहा है. कुछ मरीजों में ये इतना गंभीर है कि वो इससे संक्रमित होकर अपना दम तोड़ रहे हैं. बताया जा रहा है कि कुछ मरीजों में कम संक्रमण की वजह टीसेल्स की मौजूदगी हो सकती है. हालांकि अभी इस पर और रिसर्च की जानी बाकी है.