अब चीन नहीं कर पायेगा घुसपैठ की गुस्ताखी! जानिये कैसे लिपुलेख-मानसरोवर लिंक रोड पड़ोसी देश को दिखा रहा आइना?

भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने लिपुलेख दर्रे को मानसरोवर रूट से जोड़ने वाले लिपुलेख-मानसरोवर लिंक रोड का उद्घाटन कर दिया है. अब इसके जरिए कैलाश-मानसरोवर का रास्ता सुगम होने के साथ ही चीन के साथ सामरिक संतुलन भी कायम हो गया है.

lekhpal mansarovar link road

भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने लिपुलेख दर्रे को मानसरोवर रूट से जोड़ने वाले लिपुलेख-मानसरोवर लिंक रोड का उद्घाटन कर दिया है. अब इसके जरिए कैलाश-मानसरोवर का रास्ता सुगम होने के साथ ही चीन के साथ सामरिक संतुलन भी कायम हो गया है. लेकिन इसके बाद नेपाल में विरोध प्रदर्शनों ने जन्म ले लिया है. नेपाल सरकार इस पर ऐतराज जताते हुए लिपुलेख पर अपना दावा कर रही है. जबकि भारतीय विदेश मंत्रालय ने इससे साफ़ इंकार कर दिया है. विदेश मंत्रालय का कहना है कि सारा काम सीमा के भीतर हुआ है. बता दें नेपाल इसका विरोध करता रहा है. लेकिन ये इलाका उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले का हिस्सा है.

चीन पर भारी पड़ सकता है भारत !

ये लिपुलेख दर्रा 1700 फुट की ऊंचाई पर बना है जो आसानी से उत्तराखंड के धारचूला से जुड़ जायेगा. ये सड़क 80 किलोमीटर लंबी है और मानसरोवर लिपुलेख दर्रे से करीब 90 किलोमीटर की दूरी पर है. पहले भारत की चौकियों तक पहुँचने में करीब तीन हफ्ते का समय लगता है. अब इस रूट के जरिये ये सफ़र घटकर सिर्फ 7 दिन का रह गया है. बता दें कि बूंदी से आगे तक 51 किलोमीटर लंबा और तवाघाट से लखनपुर का 23 किलोमीटर हिस्सा बहुत पहले ही निर्मित हो चुका था. लेकिन सबसे ज्यादा वक़्त लखनपुर और बूंदी के बीच का हिस्सा बनाने में लग गया क्योंकि वो रास्ता बेहद कठिन था. अब इस रोड से आसानी से थल सेना के लिए युद्ध की सामग्री चीन के बॉर्डर तक पहुंचाना आसान हो गया है. अब इसके अलावा अक्साई चीन से सटी सीमा पर चीनी सैनिक घुसपैठ करने की गुस्ताखी नहीं कर पायेंगे.

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नेपाल कालापानी को मानता आ रहा है अपना भाग

नेपाल का कहना है कि 1816 में हुए सुगौली समझौते के तहत काली नदी के पूर्व का इलाका, कालापानी, लिम्पियादुरा, और लिपुलेख नेपाल का हिस्सा है. साथ ही नेपाल के मुताबिक वहां की सरकार ने कई बार पहले और हाल में भी कूटनीतिक तरीके से भारत सरकार को उसके नया राजनीतिक नक्शा जारी करने पर बताया था. पिछली साल जम्मू कश्मीर के पुनर्गठन क़ानून के तहत जब इसे अलग अलग दो भागों में बांटा गया था तब आधिकारिक तौर पर नया नक्शा जारी किया गया था. जिस पर नेपाल ने आपत्ति जताते हुए कालापानी को अपना हिस्सा बताया था. बता दें कि कालापानी को भारत -चीन और नेपाल का ट्राईजंक्शन भी कहते हैं. ये इलाका करीब 327 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है.

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​क्यों भारत और नेपाल में तू तू मैं मैं ?

बता दें कि नेपाल और ब्रिटिश इंडिया ने 1816 में सुगौली संधि की थी. सुगौली बिहार के बेतिया यानी पश्चिम चंपारण में नेपाल सीमा के पास एक छोटा सा शहर है. इस संधि के मुताबिक ये तय हुआ था कि काली या महाकाली नदी के पूरब का इलाका नेपाल का होगा. लेकिन बाद में काली नदी का उदगम स्थान अंग्रेज सर्वेक्षक अलग अलग बताने लगे. बता दें कि महाकाली नदी कई छोटी छोटी धाराओं से निर्मित है और इन धाराओं का उदगम स्थान अलग अलग है. नेपाल कह रहा है कि कालापानी के पश्चिम में उदगम स्थान सही है जिस लिहाज से पूरा इलाका उसका है. जबकि भारत ने डाक्यूमेंट्स के सहारे काली नदी का मूल उदगम कालापानी के पूरब में बताया है.