सुभाष चंद्र बोस के बारे में बेहद ही रोचक किस्से, जिनके बार में आप भी जानकर रह जाएंगे हैरान!

subhash chandra bose

एक ऐसा नेता जिसका उठाया हर कदम देश के लोगों को प्रभावित करता रहेगा। एक ऐसा नेता जो एक गुलाम देश को अंग्रेजों के चंगुल से बाहर निकालने में किसी भी तरह की कोई कसर नहीं छोड़ी। हम बात नेताजी सुभाष चंद्र बोस की कर रहे हैं जिनका व्यक्तित्व आज भी लोगों को प्रभावित करता है।

23 जनवरी 1897 को कटक में नेताजी पैदा हुए जिसका कद क्रांतिकारियों में सबसे ऊंचा है। दुनियाभर की सरहदे लांघी ताकि देश आजाद हो सके। नेता जी से जुड़े चौंकाने वाले किस्से हो या फिर उनके जीवन से जुड़े बड़े फैसले, अगर उनके पूरे जीवन को गौर से देख जो दिलचस्प और रोमांचक दिखता है। तो दूसरी तरफ उनकी मौत से रहस्यों से आज भी पर्दा नहीं उठ पाना कई सवाल खड़े करता है। चलिए उनके जीवन से जुड़े कुछ किस्से आज हम दोहराते हैं जो सुभाष बाबू के एक अलग व्यक्तित्व को दिखाता है।

आईएस बनाने का किस्सा

बोस के पिता ने आईएस बनाना चाहा जिसकी वजह से बोस विदेश भी गए और 1920 में आईएस की वरीयता सूची में चौथा स्थान हासिल किया, लेकिन उनके दिलों-दिमाग पर तो छाए थे स्वामी विवेकानन्द और महर्षि अरविन्द घोष के आदर्श। ऐसे में वो  आईसीएस बनकर वह अंग्रेजों की गुलामी कैसे करते। तो 22 अप्रैल 1921 को आईसीएस से त्यागपत्र दिया और लौट आए भारत। मानसिक और नैतिक विज्ञान में ट्राइपास (ऑनर्स) की डिग्री लेकर जून 1921 में सुभाष चंद्र बोस स्वदेश लौटे।

जब सरदार पटेल ने बोस पर कर दिया था केस

अगला किस्सा तब का है जब बोस कलकत्ता के मेयर पद पर थे और तब सविनय अवज्ञा आंदोलन में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। फ्रैक्चर होने की वजह से बोस की तबीयत खराब हो गई फिर उन्हें ऑस्ट्रिया पहुंचा दिया गया। सरदार वल्लभ भाई पटेल के बड़े भाई विट्ठल भाई पटेल से जहां वे मिले और उनकी इतनी सेवा की बोस ने कि विट्ठल पटेल उनसे काफी प्रभावित हुए। और तो और अपनी जायदाद का एक हिस्सा उन्होंने देश हित में काम कर ने लिए सुभाष के नाम कर दिया। ये बात जब सरदार पटेल को पता चली तो बोस से वो नाराज हुए और उन पर केस कर दिया। ये केस सुभाष बाबू हार गए।

भेष बदलने में माहिर थे सुभाष चंद्र बोस

चकमा देना, भेष बदलना या फिर चौंका देना इसमें सुभाष चंद्र बोस काफी माहिर थे। उनके रूप बदलकर अंग्रेजों से बचकर निकल जाने के कई किस्से है। अंग्रेजों ने नेताजी को 1941 में एक घर में नजरबंद किया लेकिन बोस को बड़े बड़े काम करने थे ऐसे में वे हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठ सकते थे। तब बोस ने महानिष्क्रमण यात्रा नाम से एक प्लान तय किया और रूप बदलकर नजरबंदी से भाग निकले। रूप बदलकर कार से बोस ने कलकत्ता से गोमो की यात्रा की फिर ट्रेन से पेशावर गए और फिर काबुल होते हुए जर्मनी जा पहुंचे जहां के तानाशाह अडॉल्फ हिटलर से वे मिले।

जेल का ये किस्सा आपको चौका देगा

जेल का किस्सा तो हैरान ही कर देगा। 1925 में बोस बाबू को अंग्रेजों ने बंदी बनाकर बर्मा की मंडले जेल में भेजा, जहां कैदियों की स्थिति बुरी थी। बेहद जरूरी चीजों की वहां कमी और बीमारियां ज्यादा थीं। यहां तक की वहीं पर उन्हें टीबी की बीमारी हो गई। बोस बाबू ये जानते थे कि इस जेल में उनकी जैसी हालत है इस बारे में जानकर घरवालों को बहुत दुख होगा। ऐसे में वे परिवार को लिखे पत्रों में कभी सच नहीं कहते बल्कि घरवालों को वो पत्र में लिखते कि यहां मस्त होटल का खाना मिलता है। पपीता पसंद है मैनेजर को ऐसे में यहां सब्जी, अचार, फल हर जगह ही पपीते को इस्तेमाल में लाया जाता है।

उन्होंने घरवालों को एक बिल्ली की कहानी तक लिख डाली थी ताकि घर वालों को किसी भी तरह की कोई आशंका न हो। उन्होंने लिखा कि बिल्लियों की फौज रहती थी यहां पहले घात लगाकर जिनको पकड़ा लिया गया और दूर ले जाकर छोड़ा गया जिनमें से तीन बिल्लियां काफी शरारती थीं जो लौट आईं। एक बिल्ली का नाम था टॉम था जिसने कबूतर को मार डाला। टॉम कैट पर मुकदमा चला और कड़ी सजा भी सुनाई गई पर वैष्णव भावना की वजह से क्षमादान दे दिया गया उसे।

बोस के नाम पर हैं बैरक

एक किस्सा तब का है नेताजी सुभाषचंद्र बोस को जब 1818 में निर्मित जबलपुर की जेल में दो बार कैद किया गया और दोनों बार एक ही बैरक में रखा गया। बाद में नेताजी के नाम पर जेल की उसी बैरक को रिजर्व घोषित किया गया और अब दूसरा कोई कैदी नहीं रखा जाता है उस बैरक में। आज भी इस जेल में नेताजी का सामान रखा हुआ है। जेल के बाकी कैदी उनकी याद में आज भी उनकी जयंती के मौके पर उसी बैरक पर फूल चढ़ाते हैं।

किस्सा नेताजी के प्यार का और फिर झटपट शादी का

जब ब्रिटिश सरकार ने साल 1934 में भारत से नेताजी को निर्वासित कर दिया तो वो यूरोप गए और वहां रहकर आजादी की लड़ाई से जुड़े अपने साथियों को वो लेटर लिखा करते। एक यूरोपीय प्रकाशक ने इसी दौरान उन्हें ‘द इंडियन स्ट्रगल’ किताब लिखने का जिम्मा दिया जिसके लिए उन्हें एक सहयोगी की जरूरत थी। जिसे अंग्रेजी के साथ-साथ टाइपिंग भी आती हो। इस काम के लिए ऑस्ट्रिया कि एक महिला एमिली शेंकल को रखा। काम के दौरान ही एक-दूसरे के प्रति बोस और एमिली आकर्षित हुए फिर दोनों में प्यार हुआ और नेताजी और एमिली ने शादी कर ली।

किस्सा बापू से जुड़ा

किस्सा बापू से भी जुड़ा है जब बोस बाबू ने उनसे समर्थन मांगा। रंगून रेडियो स्टेशन से 6 जुलाई 1944 को उन्होंने एक प्रसारण महात्मा गांधी के नाम जारी करके बापू से आशीर्वाद मांगी और शुभकामनाएं मांगीं।

नेताजी की मृत्यु एक रहस्य

नेताजी की मृत्यु एक रहस्य बनकर रह गई। भारत में रहने वाले उनके परिवारजन तो आज भी मानते हैं कि 1945 में सुभाष की मौत नहीं हुई। वे उसके बाद नज़रबन्द थे रूस में।